अंटार्कटिका के आसपास समुद्री बर्फ का सालाना विस्तार 2026 में भी वैज्ञानिकों की चिंता का विषय बना हुआ है। NASA और नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (NSIDC) के अनुसार, इस साल समुद्री बर्फ का अधिकतम विस्तार 14 सितंबर को दर्ज होने का अनुमान है। उस दिन बर्फ ने करीब 17.59 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ढक रखा था। यह 1979 में शुरू हुए सैटेलाइट रिकॉर्ड में तीसरा सबसे कम सालाना अधिकतम स्तर है।
यह आंकड़ा अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ के बदलते पैटर्न को समझने के लिए अहम है। हालांकि, केवल एक साल के आंकड़े से यह तय नहीं किया जा सकता कि गिरावट स्थायी बदलाव का संकेत है या प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा।
अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ कैसे बदलती है?
अंटार्कटिका और आर्कटिक की भौगोलिक बनावट अलग है। आर्कटिक में समुद्र चारों तरफ जमीन से घिरा है, जबकि अंटार्कटिका एक विशाल महाद्वीप है, जिसके चारों ओर महासागर फैला हुआ है। इस अंतर के कारण अंटार्कटिका के आसपास समुद्री बर्फ सर्दियों में दूर तक फैल सकती है।
दक्षिणी गोलार्ध में सर्दियों के दौरान बर्फ का विस्तार बढ़ता है। आम तौर पर सितंबर में यह अपने अधिकतम स्तर पर पहुंचता है। इसके बाद तापमान बढ़ने के साथ बर्फ पिघलने लगती है और फरवरी के आसपास इसका विस्तार न्यूनतम हो जाता है।
अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ का अध्ययन इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसके विस्तार में बदलाव समुद्र, वातावरण और ध्रुवीय जलवायु के बीच होने वाली प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देता है।
2014 तक बढ़ी बर्फ, फिर बदला रुझान
1979 से 2014 के बीच अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का कुल विस्तार औसतन लगभग एक प्रतिशत प्रति दशक की दर से बढ़ा था। हालांकि, इस बढ़ोतरी का दीर्घकालिक महत्व स्पष्ट नहीं था, क्योंकि इस क्षेत्र में बर्फ का विस्तार हर साल काफी बदलता है।
2012 से 2014 के बीच लगातार तीन वर्षों में सर्दियों की समुद्री बर्फ ने नए रिकॉर्ड बनाए। यह स्थिति उस समय देखने को मिली, जब आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ का विस्तार तेजी से घट रहा था।
लेकिन 2015 के बाद यह रुझान बदलने लगा। वर्ष 2016 से अंटार्कटिका के आसपास समुद्री बर्फ में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जाने लगी। बीच-बीच में कुछ वर्षों में मामूली सुधार जरूर हुआ, लेकिन कुल मिलाकर बर्फ का विस्तार सामान्य स्तर से नीचे बना रहा।
2023 में समुद्री बर्फ के न्यूनतम और अधिकतम, दोनों विस्तार के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए। इसके बाद भी वैज्ञानिकों के सामने एक अहम सवाल बना हुआ है: क्या यह गिरावट लंबे समय तक चलने वाले बदलाव का हिस्सा है, या फिर प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के कारण ऐसा हो रहा है?
इसका जवाब देने के लिए लगातार कई वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करना जरूरी है।
बादलों के पार कैसे देखते हैं वैज्ञानिक?
अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ की निगरानी के लिए वैज्ञानिक सैटेलाइट पर लगे पैसिव माइक्रोवेव सेंसर का इस्तेमाल करते हैं। ये सेंसर पृथ्वी से स्वाभाविक रूप से निकलने वाली माइक्रोवेव ऊर्जा को मापते हैं।
समुद्री बर्फ और खुले पानी से निकलने वाली माइक्रोवेव ऊर्जा में अंतर होता है। इसी अंतर की मदद से वैज्ञानिक सैटेलाइट डेटा में बर्फ से ढके क्षेत्रों की पहचान करते हैं।
इस तकनीक का एक बड़ा फायदा यह है कि माइक्रोवेव बादलों के पार भी काम कर सकते हैं। इसलिए मौसम साफ हो या आसमान बादलों से ढका हो, वैज्ञानिक नियमित रूप से समुद्री बर्फ की निगरानी कर सकते हैं।
इस रिकॉर्ड की शुरुआत 1978 के आखिर में NASA के Nimbus-7 सैटेलाइट से मिले आंकड़ों के साथ हुई थी। इसके बाद 1987 से अमेरिकी रक्षा विभाग के Defense Meteorological Satellite Program (DMSP) के सैटेलाइट भी इस काम में शामिल हुए। वर्ष 2002 से 2011 के बीच NASA के Aqua सैटेलाइट से भी उपयोगी अवलोकन मिले।
2025 में वैज्ञानिकों ने जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) के GCOM-W सैटेलाइट के आंकड़ों का इस्तेमाल शुरू किया।
समुद्री बर्फ के आंकड़ों का क्या मतलब है?
वैज्ञानिक आम तौर पर उस क्षेत्र को समुद्री बर्फ के विस्तार में शामिल करते हैं, जहां कम से कम 15 प्रतिशत सतह पर बर्फ मौजूद हो। इसे समुद्री बर्फ की सांद्रता की सीमा माना जाता है। इस मानक के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों के आंकड़ों को जोड़कर कुल विस्तार निकाला जाता है।
NASA और NSIDC के आंकड़े अंटार्कटिका में बदलती परिस्थितियों को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देते हैं। फिर भी, समुद्री बर्फ के विस्तार और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों को समझने के लिए तापमान, समुद्री धाराओं, हवाओं और अन्य पर्यावरणीय कारकों का अध्ययन भी जरूरी है।
2026 का तीसरा सबसे कम अधिकतम विस्तार इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का पुराना पैटर्न बदल सकता है। आने वाले वर्षों के सैटेलाइट आंकड़े यह स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि हाल की गिरावट लंबे समय का रुझान है या प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा।
Image Credit: NASA Earth Observatory / Michala Garrison; डेटा: National Snow and Ice Data Center (NSIDC)।


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