News Translate

Governance India Politics

Delhi Me Mass Detentions Aur Anti-CEC Protest Par Supreme Court Ki Special Hearing

Delhi Anti-CEC Protest में 2,500 से ज्यादा हिरासत, CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग, Supreme Court hearing और UN की प्रतिक्रिया के बारे में जानें।

दिल्ली में Anti-CEC Protest पर बड़ा विवाद, 2,500 से ज्यादा हिरासत के बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2026: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस कार्रवाई, बड़े पैमाने पर हिरासत और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंधों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। 10 अक्टूबर को राजधानी में 2,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने दी, जबकि प्रदर्शन से पहले रातभर चले निवारक अभियानों में करीब 1,000 अन्य लोगों को पकड़ा गया था। रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत की वैधता और सार्वजनिक परिवहन, रेल तथा मेट्रो सेवाओं को बंद करने से जुड़े मामलों पर विशेष सुनवाई की। इसी बीच Cockroach Janta Party (CJP) ने जंतर-मंतर पर एक और प्रदर्शन का आह्वान किया और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने हिरासत की खबरों पर चिंता जताई।

विवाद की जड़ कथित चुनावी अनियमितताएं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोप हैं। CJP तथा विभिन्न युवा और छात्र संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है। हालांकि, इन आरोपों पर चुनाव आयोग की कोई विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध कराए गए घटनाक्रम में दर्ज नहीं है। ऐसे में राजनीतिक मांग, पुलिस की कार्रवाई और अदालत के सामने रखे गए कानूनी सवालों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

हिरासत की कार्रवाई और दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था

10 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश की, लेकिन भारी पुलिस तैनाती, बैरिकेडिंग और यातायात प्रतिबंधों के कारण कई लोगों को रोक दिया गया। समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ प्रदर्शनकारियों को बसों में बैठाकर दिल्ली के बाहरी इलाकों में बनाए गए अस्थायी हिरासत केंद्रों तक ले जाया गया। पुलिस ने खेल परिसरों और सामुदायिक केंद्रों का भी इस्तेमाल किया।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार, शनिवार को लगभग 2,500 लोगों को हिरासत में लिया गया। इससे पहले रात में करीब 1,000 लोगों को निवारक कार्रवाई के तहत पकड़ा गया था। सूत्रों ने बताया कि हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को देर शाम तक रिहा कर दिया गया। इस दौरान कुछ पत्रकारों को भी हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई।

कई युवा संगठनों ने मुख्य प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने में बाधा आने के बाद सफदरजंग फ्लाईओवर, दिल्ली हाट, राजघाट और उत्तर-पश्चिम दिल्ली के अस्थायी हिरासत केंद्रों के आसपास प्रदर्शन करने की कोशिश की। राजधानी के मध्य हिस्से में भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग के साथ कुछ मेट्रो स्टेशन, स्कूल, कॉलेज और बाजार भी बंद रहे।

रविवार को भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की एडवाइजरी के अनुसार, सुबह छह बजे से जंतर-मंतर, कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, पटेल चौक और मध्य दिल्ली के अन्य प्रमुख इलाकों में यातायात डायवर्जन लागू किए गए। प्रतिबंधों का असर केवल प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं था, बल्कि राजधानी में सामान्य आवाजाही और सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता पर भी सवाल उठे।

गृह मंत्रालय ने 10 अक्टूबर को दिल्ली के आठ अस्थायी हिरासत केंद्रों के 500 मीटर के दायरे में दस घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का आदेश दिया था। अधिकारियों ने सार्वजनिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और अपराध के लिए उकसावे को रोकने की जरूरत को इसका आधार बताया। उपलब्ध रिपोर्ट में इस प्रतिबंध के अलग-अलग स्थानों पर वास्तविक प्रभाव का विस्तृत आकलन नहीं दिया गया है।

CJP नेताओं की रिहाई और ध्रुव राठी की हिरासत का मामला

CJP के संस्थापक अभिजीत डिपके, सह-संयोजक सौरव दास और प्रवक्ता आशुतोष रंका को करीब 24 घंटे हिरासत में रखने के बाद रविवार सुबह दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन में कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। पार्टी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने बताया कि तीनों नेताओं को एक वर्ष तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर रिहा किया गया।

रिहाई से पहले पार्टी ने कहा था कि उसके नेताओं को हिरासत में रखे जाने के कारण उनसे संपर्क करना मुश्किल हो रहा था। डिपके के पिता भगवान डिपके ने भी अपने बेटे से संपर्क नहीं हो पाने पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस सही जानकारी नहीं दे रही थी और कहा कि दोस्तों से उन्हें पता चला था कि उनके बेटे को कहीं और स्थानांतरित किया गया है।

इसी घटनाक्रम में यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी गुरुग्राम पुलिस ने रिहा कर दिया। पुलिस प्रवक्ता के अनुसार, उनके खिलाफ कोई आरोप दर्ज नहीं किया गया। राठी को 10 अक्टूबर को गुरुग्राम के सेक्टर 56 स्थित उनके आवास से हिरासत में लिया गया था। उनकी रिहाई ऐसे समय हुई, जब दिल्ली में प्रदर्शन से जुड़े लोगों की हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठ रहे थे।

हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। CJP की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने कहा कि पार्टी ने अपने नेताओं की रिहाई और उन्हें अदालत के सामने पेश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिका दायर नहीं की थी। दूसरी ओर, कवरेज समन्वयक गौरव भारती की ओर से अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल किए जाने की जानकारी सामने आई। याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड शाश्वत आनंद ने कहा कि इसे वापस लेने का अनुरोध इसलिए किया गया, क्योंकि संबंधित व्यक्ति को पार्टी की ओर से कार्यवाही शुरू करने का आधिकारिक निर्देश नहीं मिला था।

CJP ने रविवार को दोपहर दो बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की घोषणा की थी। संगठन के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे के इसमें शामिल होने की उम्मीद जताई गई। पार्टी ने साफ किया कि वह CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रखेगी।

सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वकीलों ने पुलिस की जवाबदेही पर उठाए सवाल

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई सुबह 10:30 बजे निर्धारित थी। सुनवाई के लिए वकील अदालत परिसर में जमा हुए, लेकिन कोर्ट रूम 18 में जगह की कमी के कारण अव्यवस्था पैदा हुई। वकीलों ने ऑनलाइन सुनवाई का लिंक खोलने और बड़ी जगह उपलब्ध कराने की मांग की। बाद में सुनवाई के लिए अदालत कक्ष बदला गया और ऑनलाइन लिंक भी चालू हुआ।

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने नेताओं, पूर्व मुख्यमंत्रियों, छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और वकीलों सहित लोगों की कथित मनमानी हिरासत को चुनौती दी। वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने सार्वजनिक परिवहन, रेल और मेट्रो सेवाओं को बंद करने के फैसले को लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने मामले को “असाधारण और अत्यावश्यक” बताया। पीठ में जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बड़े पैमाने पर हिरासत का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कुछ लोगों को ट्रेनों से भी पकड़ा गया। उन्होंने सवाल किया कि निवारक आदेशों के तहत निर्धारित चार किलोमीटर के दायरे से बाहर लोगों को किस आधार पर हिरासत में लिया गया। सुनवाई के दौरान सिब्बल ने CPI(M) महासचिव एम.ए. बेबी की ओर से दायर याचिका और अन्य अवमानना याचिकाओं का भी उल्लेख किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अपने हिरासत के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि शहर में माहौल बेहद दमनकारी था और उन्हें चलती बस में फेंक दिया गया था। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा करने की अपील की। उनके बयान के अनुसार, स्थिति ऐसी थी कि देश पुलिस राज्य बनने के बेहद करीब पहुंच गया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने राजधानी में स्वतंत्र आवाजाही बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि 10 अक्टूबर को बिना पहचान बैज वाले पुलिसकर्मी घूम रहे थे और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर धारा 163 अब भी लागू थी तो क्या इसके लिए संबंधित अधिकारियों की अनुमति ली गई थी।

एन. हरिहरन ने प्रदर्शन के दौरान कथित दुर्व्यवहार की तस्वीरें अदालत में पेश कीं। जस्टिस बागची ने कहा कि तस्वीरों को इस तरह सीधे नहीं सौंपा जा सकता और उन्हें रिकॉर्ड पर लाने के लिए उचित आवेदन दाखिल किया जाना चाहिए।

वेणुगोपाल की परिवहन प्रतिबंधों से संबंधित याचिका पर अदालत ने कहा कि इस पर 12 अक्टूबर को विचार किया जाएगा। उपलब्ध घटनाक्रम में सुनवाई के अंतिम आदेश या पुलिस की ओर से आरोपों पर विस्तृत जवाब दर्ज नहीं है।

कानूनी सवालों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया तक

विवाद का एक बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों के दायरे से जुड़ा है। कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि जब निषेधात्मक आदेश नई दिल्ली जिले में लागू थे, तब दूसरे इलाकों में लोगों को किस आधार पर हिरासत में लिया गया। CJP के तीन नेताओं को दिल्ली पहुंचने के बाद उनकी एयर इंडिया की उड़ान में पुलिस के चढ़ने के बाद हिरासत में लिए जाने की जानकारी भी सामने आई।

इस मामले में कानूनी सवाल केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हैं। इसमें निवारक हिरासत के आधार, लोगों को हिरासत में लेने की प्रक्रिया, सार्वजनिक परिवहन बंद करने की जरूरत और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर प्रतिबंध की सीमा जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन सवालों पर अंतिम कानूनी स्थिति अदालत के आदेशों और संबंधित पक्षों के जवाब से ही स्पष्ट होगी।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में बड़े पैमाने पर हिरासत की खबरों पर चिंता जताई। उसने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान सुनिश्चित करने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को तत्काल तथा बिना शर्त रिहा करने की अपील की।

केंद्र सरकार ने इस बयान को खारिज करते हुए इसे भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताया। इस तरह विवाद ने देश के भीतर कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं की बहस के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का रूप भी ले लिया।

आगे की सुनवाई पर टिकी नजरें

12 अक्टूबर को प्रस्तावित सुनवाई में सार्वजनिक परिवहन बंद करने से जुड़ी याचिका पर आगे की कार्रवाई देखी जाएगी। हिरासत की वैधता, पुलिस की जवाबदेही और प्रतिबंधात्मक आदेशों के दायरे पर उठाए गए सवालों के जवाब भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया में अहम रहेंगे।

इस बीच, CJP ने प्रदर्शन जारी रखने और अपने नेताओं की रिहाई के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की घोषणा की है। दिल्ली में यातायात प्रतिबंधों और सुरक्षा व्यवस्था का असर भी आंदोलन के अगले चरण को प्रभावित कर सकता है।

मुख्य बातें

  • दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार, 10 अक्टूबर को 2,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि करीब 1,000 लोगों को पहले निवारक अभियानों में पकड़ा गया था।

  • CJP के अभिजीत डिपके, सौरव दास और आशुतोष रंका को एक वर्ष तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर रिहा किया गया।

  • सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत और परिवहन प्रतिबंधों से जुड़ी याचिकाओं पर विशेष सुनवाई की।

  • OHCHR ने हिरासत की खबरों पर चिंता जताई, जबकि केंद्र सरकार ने उसके बयान को खारिज किया।

  • परिवहन बंद करने से जुड़ी याचिका पर 12 अक्टूबर को आगे विचार होना था।

आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही और आंदोलन की दिशा इस विवाद को नई दिशा दे सकती है। आपके विचार में लोकतांत्रिक विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाना चाहिए?

Disclaimer: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार सामग्री और संबंधित पक्षों के दर्ज बयानों पर आधारित है; आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा अदालत के अंतिम निष्कर्षों को अलग से देखा जाना चाहिए।

SRA
Ajay Kumar
Founder & Chief Editor • Story Real A

Investigative journalist and founder of Story Real A, focusing on public policy, national socioeconomic developments, governance, and grassroots reporting across India.

Comments & Discussion

Comments