ईरान ने अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता के दरवाजे खुले रखे हैं, लेकिन तेहरान ने साफ कर दिया है कि बातचीत पुराने हालात से शुरू नहीं होगी। 12 अक्टूबर को ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि बीते दो वर्षों के अनुभव, सैन्य तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों को नजरअंदाज करके कूटनीति को फिर से शुरुआत के बिंदु पर नहीं लाया जा सकता।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बघाई के बयान से स्पष्ट है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वह अपनी शर्तों और राष्ट्रीय हितों से पीछे हटने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोहरा रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। ऐसे में दोनों देशों के बीच किसी समझौते तक पहुंचने का रास्ता अभी भी मुश्किल नजर आ रहा है।
बातचीत के लिए तैयार, लेकिन पुरानी शर्तों पर नहीं
बघाई ने कहा कि ईरान बातचीत की मेज से भागने वाला नहीं है। उनके मुताबिक, कूटनीति ईरान की रणनीति का उतना ही अहम हिस्सा है जितना राष्ट्रीय रक्षा और सैन्य तैयारी।
उन्होंने कहा, "हम कभी भी फिर से शून्य से शुरुआत नहीं करेंगे।" बघाई का तर्क है कि पिछले दो वर्षों में हुई घटनाओं ने ईरान की सोच और रणनीति को बदल दिया है। तेहरान अब उन अनुभवों के आधार पर अपनी क्षमताओं को मजबूत करने और दूसरे पक्ष की गलतियों से सीखने पर ध्यान देगा।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर लंबे समय से विवाद जारी है। अमेरिका ईरान की परमाणु गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण चाहता है, जबकि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण उपयोग के अधिकार और आर्थिक दबाव से राहत की मांग करता रहा है।
बघाई ने अमेरिका की बातचीत की पेशकश पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ सैन्य दबाव और आर्थिक प्रतिबंध जारी रखना, दूसरी तरफ बातचीत की इच्छा जताना, कूटनीति की भावना से मेल नहीं खाता।
हालांकि, ये आरोप ईरानी सरकार का पक्ष हैं। अमेरिका की ओर से इन विशेष टिप्पणियों पर कोई जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया है।
परमाणु सुरक्षा और NPT को लेकर बढ़ती चिंता
ईरानी प्रवक्ता ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से ईरान के संभावित बाहर निकलने को लेकर उठ रही चिंताओं पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु ढांचे पर हुए हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया ने देश के भीतर इस मुद्दे पर बहस को बढ़ावा दिया है।
NPT का उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। ईरान की संधि में सदस्यता और उसकी परमाणु गतिविधियों की निगरानी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए अहम मुद्दे हैं।
बघाई ने कहा कि यदि परमाणु अप्रसार व्यवस्था की नींव कमजोर हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार पक्षों को जवाब देना चाहिए। उनका आरोप था कि ईरान के परमाणु ढांचे पर हमलों और उन पर प्रभावी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई नहीं होने से इस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।
तेहरान का यह रुख वार्ता को और जटिल बना सकता है। यदि परमाणु गतिविधियों की निगरानी, सुरक्षा गारंटी और प्रतिबंधों में राहत पर सहमति नहीं बनती, तो किसी नए समझौते की राह लंबी हो सकती है।
काहिरा समझौता पीछे छूटा, पाकिस्तान और कतर की भूमिका अहम
बघाई ने ईरान और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बीच पहले हुई व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि विरोधी पक्षों ने उस अवसर का सही इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने काहिरा समझौते को अब इतिहास का हिस्सा बताया और संकेत दिया कि तेहरान उसे मौजूदा गतिरोध का सीधा समाधान नहीं मान रहा।
मध्यस्थता के सवाल पर ईरान ने पाकिस्तान और कतर की भूमिका को रेखांकित किया। बघाई के मुताबिक, दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने तथा बातचीत के लिए रास्ता बनाने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और ट्रंप के साथ बातचीत के दौरान परमाणु विवाद का मुद्दा उठाया है। पुतिन का कहना है कि कूटनीति की संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं और समझौता संभव होने के साथ जरूरी भी है।
वहीं, ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ संघर्ष जल्द समाप्त हो सकता है, चाहे इसके लिए सैन्य दबाव जारी रखना पड़े या अमेरिकी शर्तों पर समझौता हो। उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।
Key Takeaways: Iran-US Nuclear Dispute की 4 बड़ी बातें
बातचीत के लिए दरवाजे खुले: ईरान ने अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता से इनकार नहीं किया है।
पुराने हालात में वापसी नहीं: तेहरान चाहता है कि पिछले दो वर्षों की घटनाओं और अनुभवों को बातचीत में शामिल किया जाए।
मध्यस्थता जारी: ईरान ने पाकिस्तान और कतर को अमेरिका के साथ संपर्क में अहम मध्यस्थ बताया है।
परमाणु सुरक्षा पर टकराव: NPT, परमाणु ढांचे की सुरक्षा, प्रतिबंध और निगरानी जैसे मुद्दे विवाद के केंद्र में बने हुए हैं।
आगे क्या? समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा क्या होगी
आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या अमेरिका और ईरान अपनी शुरुआती शर्तों में इतनी गुंजाइश छोड़ेंगे कि बातचीत किसी ठोस समझौते तक पहुंच सके। तेहरान सुरक्षा, संप्रभुता और प्रतिबंधों के मुद्दे उठाता रहेगा, जबकि वॉशिंगटन परमाणु हथियारों की रोकथाम को अपनी प्राथमिकता बनाए हुए है।
पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता, रूस की कूटनीतिक पहल और IAEA की भूमिका आगे की बातचीत में अहम हो सकती है। लेकिन केवल बातचीत की इच्छा जताना काफी नहीं होगा। दोनों पक्षों को निगरानी, सुरक्षा और प्रतिबंधों पर ऐसे कदम तय करने होंगे जिन पर अमल भी किया जा सके।
फिलहाल, ईरान का संदेश साफ है: बातचीत हो सकती है, लेकिन पिछली घटनाओं को भुलाकर नहीं।
आपकी राय में, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता संभव है, या दोनों देशों की सख्त शर्तें तनाव को और बढ़ाएंगी?
Disclaimer: यह समाचार उपलब्ध रिपोर्टों और संबंधित पक्षों के सार्वजनिक बयानों पर आधारित है; विवादित आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में प्रस्तुत किया गया है और स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक हो सकती है।

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